जनमानस की अमूल्य निधि–पंडित जवाहर लाल नेहरु

पं० नेहरु का जन्म प्रयाग में १४ नवम्बर १८८९ में हुआ था। वे बुद्धिवादी विधि विशेषज्ञ थे। भावुकता और कल्पना उनसे बहुत दूर थी। वे अपने साहस औ बुद्धिबल से अडिग विशवासी थे। भारतवर्ष केप्रमुख कानून विशेषज्ञों में उनकी गणना थी। सात वर्ष तक विलायत में शिक्षा ग्रहण करने के बाद १९१२में बैरिस्ट्री पास करके जवाहर लाल भारतवर्ष लौटे।विलायत से लौटकर जवाहर लाल जी भी देश की राजनीति में भाग लेने लगे। जब देश में असहयोग आन्दोलन शुरु हुआ, पं नेहरु बड़े प्रसन्न हो उठे, उन्होंने इसमें भाग लिया। १९३६ और ३७ में क्रमशः लख़नऊ और फैज़पुर कांग्रेस अधिवेशनों में उन्होंने अध्यक्ष पद सुशोभित किया। पं नेहरु अद्वितीय राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक उच्च कोटि के लेखक भी थे।पं नेहरु एक अन्तर्राष्ट्रीय महापुरुष थे। नेहरु जी एशिया के प्रेरणा स्त्रोत थे।उनके जीवन के प्रमुख साथी थे अभय और साहस। निरन्तर तीस वर्षोतक वे ब्रिटिश शासन से जूझते रहे भारत को मुक्ति प्रदान कराने के लिए। देश का बच्चा -बच्चा भी जवाहर ला ल की जय बोलने लगा था। जवाहर लाल जी को बच्चों से बेहद प्यार था। उनका जन्मदिन ‘बाल-दिवस’के रुप में मनाया जाता है। भारत का यहन ह्रदय सम्राट और अप्रतिम नेता अपनी कीर्ती और गौरव के शिखर पर पहुँचकर २७ मई१९६४को अपनी इस नश्वर काया को छोड़कर सदा सर्वदा के लिएअमर हो गया। नेहरु जैसा महाप्राण व्यक्ति किसी भी देश में सहस्त्रों वर्षों के बाद ही उत्पन्न हुआ करता है।

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