Archive for नवम्बर, 2011

जय जवान जय किसान

कथन बड़े सारगर्भित तथा अनुभूतिपूर्ण होते हैं। ये एक प्रेरक के समान होते हैं।इनमें जीवन की दिशा को बदल देने कि शक्ति होती है। ये हमारी सुप्त आत्मा को जगाते हैं। ‘स्वराज्य हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है,’ भारत छोड़ो’, ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा’ , ‘जय हिन्द’ आदि ऐसे कथन हैंजो हमारे देश भक्तों के मुख से निके। धीरे-धीरे इनकी लोकप्रियता बढ़ती गई और कालान्तर में उन्होंने नारों का रुप ले लिया। “जय जवान जय किसान”का नारा भारत के द्वितीय प्रधान मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने दिया था।शास्त्री जी की धारणा थीकि देश की रक्षाएवं पोषण का उत्तरदायित्व जवान और किसान के ऊपर है। सारा देश इनके ऊपर निर्भर करता है। जब देश के जवान मातृभूमि की रक्षा के लिए पाकिस्तान की सेना से टक्कर ले रहे थे तब शास्त्री जी के मुख से यह नारा प्रस्फुटित हुआ।जय जान सेअभिप्राय भारत के उस सैनिक से हैजो देश की रक्षा के लिए सीमाओं पर तैनात हैं। हनमें त्याग एवं तपसया की अदभुत क्षमता होती है————-
जग भूले, पर मुझे एक , बस, सेवा-धर्म निभाना है। जिसकी यह देह उसी में इसे मिट जाना है।।
जवान बन्दूक लेकर देश की रक्षा करता है तो किसान कन्धे पर हल सजाकर अपने खेतों की ओर बढ़ता है। दोंनो कार्य जटिल है। किसान कठोर साधना द्वारा भूख और अकाल का सामना करता है। किसान का जीवन सादा होता है। किसानों की घोषणा कितनी विश्वास पूर्ण है————
हमारे हाथ में हल है, हमारे हाथ में बल है , कि हम बंजर को तोड़ेंगे।
बिना तोड़े न छोड़ंगे।।
कड़ी धरती इधरभी है, कड़ी धरती उधर भी है , कि हम उनको विदारेंगे , नचूकेंगे न चूकेंगे।
जवानों का यह कर्तव्य है कि वे किसानों के खेतों की रक्षा करने के लिए शत्रु से डटकर लोहा ले। खेत की रक्षा जीवन की रक्षा है।
किसान दिवस और डा० राजेन्द्र प्रसाद जयन्ती ३-१२-११को है ।इसकी सभी को शुभकामना।

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जनमानस की अमूल्य निधि–पंडित जवाहर लाल नेहरु

पं० नेहरु का जन्म प्रयाग में १४ नवम्बर १८८९ में हुआ था। वे बुद्धिवादी विधि विशेषज्ञ थे। भावुकता और कल्पना उनसे बहुत दूर थी। वे अपने साहस औ बुद्धिबल से अडिग विशवासी थे। भारतवर्ष केप्रमुख कानून विशेषज्ञों में उनकी गणना थी। सात वर्ष तक विलायत में शिक्षा ग्रहण करने के बाद १९१२में बैरिस्ट्री पास करके जवाहर लाल भारतवर्ष लौटे।विलायत से लौटकर जवाहर लाल जी भी देश की राजनीति में भाग लेने लगे। जब देश में असहयोग आन्दोलन शुरु हुआ, पं नेहरु बड़े प्रसन्न हो उठे, उन्होंने इसमें भाग लिया। १९३६ और ३७ में क्रमशः लख़नऊ और फैज़पुर कांग्रेस अधिवेशनों में उन्होंने अध्यक्ष पद सुशोभित किया। पं नेहरु अद्वितीय राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक उच्च कोटि के लेखक भी थे।पं नेहरु एक अन्तर्राष्ट्रीय महापुरुष थे। नेहरु जी एशिया के प्रेरणा स्त्रोत थे।उनके जीवन के प्रमुख साथी थे अभय और साहस। निरन्तर तीस वर्षोतक वे ब्रिटिश शासन से जूझते रहे भारत को मुक्ति प्रदान कराने के लिए। देश का बच्चा -बच्चा भी जवाहर ला ल की जय बोलने लगा था। जवाहर लाल जी को बच्चों से बेहद प्यार था। उनका जन्मदिन ‘बाल-दिवस’के रुप में मनाया जाता है। भारत का यहन ह्रदय सम्राट और अप्रतिम नेता अपनी कीर्ती और गौरव के शिखर पर पहुँचकर २७ मई१९६४को अपनी इस नश्वर काया को छोड़कर सदा सर्वदा के लिएअमर हो गया। नेहरु जैसा महाप्राण व्यक्ति किसी भी देश में सहस्त्रों वर्षों के बाद ही उत्पन्न हुआ करता है।

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