अरुण यह मधुमय देश हमारा

अरुण यह मधुमय देश हमारा———– मेरा महान देश भारत सब देशों में शिरोमणि है। इसका अतीत स्वर्णिम रहा है। एक समय था जब इसे सोने की चिड़िया कहा जाता था।”यह मेरा देश है” कथन में कितनी मधुरता है। इस पर जो कुछ है सब मेरा है। जो व्यक्ति ऐसी भावना से रहित है , उसके लिए ठीक ही कहा गया है——-
जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है।।
देश के प्रति हमारे अनेक कर्तव्य हैं। जिस देश के नागरिक जितने शिष्ट , सभ्य और शिक्षित होंगे, वह राष्ट्र उतना ही विकसित माना जाएगा। भगतसिंह जैसे देशभक्तों ने हँसते-हँसते फाँसी के फन्दे चूम लिए। अनेको ने जेल की यात्रा की। अतःहमें भी स्वार्थ को त्यागकर अपने देश को उन्नत बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। बहुत से लोग स्वार्थ को महत्व देते हैं। उन्हीं स्वार्थी लोगों के परिणामस्वरुप ही देश में आर्थिक संकट , महंगाई और निर्धनता की बढ़ोत्तरी हो रही है। तन मन धन से देश की सेवा करिए। श्रीधर पाठक के शब्दों में———
जय उज्ज्वल कीर्ति विशाल हिन्द, जय करुण सिनधु, कृपालु हिन्द।
जय जयति सदा स्वाधीन हिन्द, जय जयति-जयति प्राचीन हिन्द।।
सभी भारतवासियों को मेरी ओर से स्वाधीनता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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