Archive for जून, 2011

निर्जला एकादशी

हिन्दु जाति में सबसे अधिक प्रचलित एकादशी का व्रत माना जाता है। शास्त्र-पुराणों में एकादशी व्रत का फल शरीरारोग्य , दीर्धायु, इस लोक में सम्पूर्ण सुख भोग और अन्त में मोक्ष कहा गया है। वैष्णवों के लिए , ग्रहस्थों के लिए केवल शुक्ल पक्ष की एकादशी में व्रतोपवास का आदेश है। किन्तु दोनों पक्षों की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है। अशक्त अवस्था में दूध और फल का आहार करना चाहिए। निर्जला एकादशी का व्रत अत्यन्य संयम-साध्य है। नियमपूर्वक व्रत पूर्ण करने के पश्चात शक्ति के अनुसार अन्न, वस्त्र ,छतरी, फल ,स्वर्ण और जल-युक्त कलश दान देने का विधान है। इस एकादशी की महिमा महर्षि व्यास ने स्वयं अपने मुख से कही है। इस दिन गऊ को आटे की लोई देने का बहुत महत्व है।

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विश्व पर्यावरण दिवस पर आप सभी को एक पौधा ज़रुर लगाना चाहिए।

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पर्यावरण दिवस पर पेड़-पौधे और हम————–

पृथ्वी को हरा-भरा , सुन्दर तथा आकर्षक बनाने में वृक्षों का बहुत बड़ा योगदान है। अतः उनके संरक्षण एवं उनकी वृद्धि में प्रत्येक भारतवासी को सहयोग देना चाहिए। यह हमारा जीवन हैं। वृक्षों को काटे बिना गुज़ारा नही पर उनको काटने के साथ-साथ नए वृक्ष लगाने की योजना भी बनानी चाहिए। जितने वृक्ष काटे जाए उससे अधिक लगाए जाएं।जनता तथा सरकार का यह कर्तव्य है कि पेढ़-पौधों की संख्या को बढ़ाने में योगदान दे। वृक्षों से सबसे बड़ा लाभ यह है कि वर्षा कराने में सहायक सिद्ध होते हैं। ग्रीष्मकाल में वृक्ष ही हमें सुखद छाया प्रदान कर सुख और शांति पहुँचाते हैं। इतना ही नहीं वृक्षों से हमें नैतिक शिक्षा भी मिलती है।मनुष्य के निराशाओं से भरे जीवन में आशा और धैर्य की शिक्षा विद्वानों ने वृक्षों से सीखना बताया है। मनुष्य जब यह देखता है कि कटा हुआ वृक्ष भी कुछ दिनों बाद फिर हरा-भरा हो उठता है———— तो उसकी समस्त निराशाएं शांत होकर धैर्य और साहस भरी आशायें हरी-भरी हो उठती हैं। वृक्षों से हमें परकल्याण की शिक्षा भी मिलती है।
वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखें , नदी न सिंचे नीर।
परमारथ के कारनै , साधुन धरा सरीर।।
अतः यह सिद्ध सत्य है कि पेढ़हमारे देश की नैतिक ,सामाजिक और आर्थिक समृद्धि के मूल स्त्रोत हैं।

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