श्रमदान

अन्तःकरण     की विशुद्धता  के लिए जहाँ  अनेक सात्विक मार्ग हैं , वहाँ श्रमदान भी एक श्रेष्ठ मार्ग है। इससे हमारा शारीरिक और मानसिक विकास होता है। हमारे ह्रदय में विश्व बंधुत्व की भावना की वृद्धि होती है। हमें ज्ञान का प्रकाश प्राप्त होता है।भारत में श्रमदान का श्रीगणेश २३ जनवरी१९५३ को हुआ।हमारे देश में राष्ट्रीय योजनाओं को कार्यान्वित करने में शासन और शासितों  अर्थात‌  जनता का पूर्ण सहयोग प्राप्त नही होता। जनता समझती है कि यह कार्य केवल सकार का ही है तथा उसका हक तो केवल उसके उपयोग के लिए हि है।इसका मूल कारण यह हैकि भारतीय जनता इस प्रकार की योजनाओं का अपनी अशिक्षा  और अज्ञानताओं के कारण वास्तविक मूल्यांकन करने में असमर्थ है। सुबह का अपने घर से निकला हुआ मजदूर, अध्यापक, वकील दिन भर घोर परिश्रम करने के बाद थकामांदा जब संध्या को अपने घर लौटता है , तब उसके पास न श्रमदान की शक्ति रहती है और न देशहित  के अन्य  कार्य के लिए समय। देश  की आर्थिक अवस्था सुधार कर जनता को सुखी एवम सम्पन्न बनाने के लिए यह आवश्यक है कि श्रमदान के महत्वपूर्ण आन्दोलन को हम पुनः जीवित करें तथा उसमें हम तन , मन ,धन से पूर्ण सहयोग दें। इससे केवल यह लाभ न होगा कि हम अपनी योजनाओं को सफल बना सकेंगे , अपितु हमारे दिल में परोपकार,त्याग,उदारताऔरदया आदि उज्जवल भावनाओं का उदय होगा।हमारा नैतिक स्तर उन्नत होगा और हम स्वारथ की पाशविक भावनाओं से ऊपर उठकर मनुष्यत्व की ओर अग्रसर होंगे और हममें भ्रातृत्व की भावना जागृत होगी।
श्रमिक – दिवस पर  सभी मजदूर बहनें और भाईयों को मेरी शूभकामनाएं।

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