Archive for अप्रैल, 2010

सत्यवचन

दिल   को   प्यार   में   भर   दो। यह   वह   दिव्य  ज्योति   है , जो  क्षण   भर  में   दुःख   को   मिटाकर   सुख़ी    कर  देती  है।

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सत्यविचार

मूर्ख़  वे   हैं ;  जो   पीढ़ियाँ   बताकर  अपने  को  बड़े   ख़ानदान  वाला  मानते  हैं  लेकिन   असली  ख़ानदानी   वही  है   जो  गुणवान  है।

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ग्रीष्म ऋतु

परिवर्तनशीलता    प्रकृति   का  स्वभाव  है। यदि  यह  परिवर्तन शीलता  न  हो  तो   वसन्त  की  सुषमा  का  कोई  मूल्य  न रहे  और  शिशिर    का  तुषारापात  निर्रथक  हो  जाए। क्योंकि  दुख़   के   बिना   सुख़  भी  निस्सार  है——-
                      बिन  दुख  के   है  सुख  निस्सार।
                      बिना  आँसू  के  जीवन  भार।।
   मादक  वसन्त  का  अन्त  होते  ही   ग्रीष्म की  प्रचंडता  आरम्भ   हो  जाती   है। दिन  बड़े  हो  जाते  हैं।शरद ऋतु का    बाल  सूर्य ग्रीष्म  ऋतु  को  प्राप्त  होते  ही   शंकर  की  क्रोधाग्नि-सी  बरसाने  लगा  है।  ज्येष्ठ  मास में  तो  ग्रीष्म  की   अखंडता   और  भी  प्रखर  हो  जाती है। छाया  भी छाया  ढूंढने      लगती  है।यह   ऋतु  प्रकृति  के   सर्वाधिक   उग्र  रुप  की  द्योतक है। परन्तु  इसकी  उग्रता  भी  मानव  के  लिए  वरदान  है। आतप  की  प्रचंडता  के  कारण  ही   फसल  पकती है  और  भविष्य में  वर्षा  होती  है।ग्रीष्म  का  तन  कठोर  होते  हुए  भी   मन   बड़ा   कोमल  है। इसकी  शुष्कता  में  ही   रसाल की  सरसता  उत्पन्न  होती  है। खरबूजा, तरबूज, ककड़ी, अलूचे , आलूबुखारा , आड़ूऔर  फसलों  में   इसकी  सरसता  समा  जाती  है।ग्रीष्म  ऋतु  हमें  शक्ति  और  प्रचंडता  का  संदेश   देती   है।तप  से  ही  तेज  की  वृद्धि  होती  है।

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स्त्री-शिक्षा

प्राचीन काल से ही स्त्रियों  का हमारे देश में महत्व रहा है।इतिहास  इस बात का साक्षी  है।एक कुशल ग्रहणी  के लिए  शिक्षित होना अनिवार्य है। शिक्षा  से नारी  में  अनेक गुणों का समावेश हो जाता है। जैसे मस्तिष्क का विकास , स्वास्थ्य में सुधार , अपने ग्रहस्थ की सुचारु रुप से देखभाल  करना , आत्म निर्भरता , व्यवहार में कुशल होना आदि।
         उपर्युक्क्त  सभी  बातें  तभी  सम्भव  हो सकती  हैं जबकि स्त्रियाँ  शिक्षित हों।  माताएँ समाज का आधार हैं  और   शिक्षित  माताएँ जात  का  भविष्य।

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