Archive for जून, 2009

सुविचार

दुनिया  में  अस्थाई  चीज़े  तो  बहुत  सी  हैं,  परन्तु  जीवन  जैसी  अविश्वसनीय  कोई  भी  चीज  नहीं।

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समाजवाद और गाँधीवाद

आज  के  युग  से  पूर्व,  लगभग  दो  शताब्दियों  तक  विश्व  में  पूँजीवाद  का  अखंड  एवं  अबाध  सामा्रज्य  रहा।आज  मनुष्य  को  इन  सामाजिक और  आर्थिक  विषमताओं  ने  इतना  निरीह कर  दिया  है कि  कुछ  नहीं  कहा  जा  सकता।समाजवाद  और  गाँधीवाद  ये  दो  विचारधाराएँ  भी  मानव  समाज  को  सुख़ी, सम्पन्न  एवं  समृद्ध  बनाने  के  लिए  अपना  विभिन्न  दृष्टिकोण  प्रस्तुत  करती  हैं।यद्धपि  दोनों  विचारधाराओं  का  लक्ष्य  बिन्दु  एक  ही  है , फिर  भी, साध्य  समान  होते  हुए भी  साधनों  की  वरिष्ठता  में  पर्याप्त  अन्तर  है। गाँधीवाद  चाहता  है  कि  श्रेष्ठ  लक्ष्य  की  प्राप्ति  श्रेष्ठ  साधन  से  हो,  जबकि  समाजवादी  या  साम्यवादी  किसी  भी  साधन  का  उपयोग  अनुचित  नहीं  समझते। निःसन्देह  भारतवर्ष  में  गाँधीवाद  ही  सफल  हो  सकता  है। क्योंकि  यह  भूमि  त्याग, तपस्या  और  साधनाओं  की  ऋषि-महाऋषियों  की  भूमि  है। गाँधीवाद  अन्याय  और  शोषण  की  समाप्ति  शाँन्तिपूर्ण  अहिंसात्मक  उपायों  द्वारा  ही  करना  चाहता  है,  जबकि  समाजवाद ी  या  साम्यवादी  यह  विश्वास  रखते  हैं  कि  इस  प्रकार  की  शोषण  संस्थानों  को  शांतिपूर्ण  प्रयासों  से  नष्ट  नहीं  किया  जा  सकता।

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धर्म और विज्ञान

धर्म  और  विज्ञान  परस्पर  एक-दूसरे  के  विरोधी  नहीं  हैं, अपितु  एक-दूसरे  के  पूरक  हैं। बिना  धर्म  के विज्ञान  का  काम  नहीं  चल  सकता और  बिना  विज्ञान  के  धर्म  का काम  नहीं  चल  सकता।ह्रदय  और  मस्तिष्क  का  समन्वय  ही  संसार  में  सुख़,  समृद्धि  और  शांति  स्थापित  कर  सकता  है ; धर्म  और  विज्ञान  आपस  में  मित्र  हैं  शत्रु  नहीं। मित्र, मित्र  की  सहायता  करता  है तभी  विजय  होती  है और  यदि  मित्र  शत्रु  से  जा  मिले या  पृथक्  हो  जाए, तो  एक  मित्र  की  विजय  भी  पराजय  में  परिवर्तित  हो  जाती  है। आज  के  विश्व  को  शंति  भी  चाहिए  और  समृद्धि  भी। लोक  मंगल  के  लिए  धर्म  और  विज्ञान का  अन्योन्याश्रित  होना  परमावश्यक  है। आज  के  वैज्ञानिक  मानव  के  विषय  में  महाकवि  दिनकर  की  भावनाएँ————
    व्योम   से    पाताल    तक   सब  कुछ  उसे   है  श्रेय
    पर,  न  यह  परिचय  मनुज  का,  यह  न  एक  श्रेय।
    श्रय   उसका, बुद्धि  पर  चैतन्य  उर   की   जीत;
       श्रेय  मानव   को   असीमित   मानवों  से  प्रीत।
   एक   नर   से  दूसरे  के  बीच  का  व्यवधान
   तोड़   दे  जो  बस ,  वही   ज्ञानी   वही   विद्वान।।

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धर्म और विज्ञान

धर्म  और  विज्ञान  परस्पर  एक-दूसरे  के  विरोधी  नहीं  हैं, अपितु  एक-दूसरे  के  पूरक  हैं। बिना  धर्म  के विज्ञान  का  काम  नहीं  चल  सकता और  बिना  विज्ञान  के  धर्म  का काम  नहीं  चल  सकता।ह्रदय  और  मस्तिष्क  का  समन्वय  ही  संसार  में  सुख़,  समृद्धि  और  शांति  स्थापित  कर  सकता  है ; धर्म  और  विज्ञान  आपस  में  मित्र  हैं  शत्रु  नहीं। मित्र, मित्र  की  सहायता  करता  है तभी  विजय  होति  है और  यदि  मित्र  शत्रु  से  जा  मिले या  पृथक्  हो  जाए, तो  एक  मित्र  की  विजय  भी  पराजय  में  परिवर्तित  हो  जाती  है। आज  के  विश्व  को  शंति  भी  चाहिए  और  समृद्धि  भी। लोक  मंगल  के  लिए  धर्म  और  विज्ञधर्म  और  विज्ञान  परस्पर  एक-दूसरे  के  विरोधी  नहीं  हैं, अपितु  एक-दूसरे  के  पूरक  हैं। बिना  धर्म  के विज्ञान  का  काम  नहीं  चल  सकता और  बिना  विज्ञान  के  धर्म  का काम  नहीं  चल  सकता।ह्रदय  और  मस्तिष्क  का  समन्वय  ही  संसार  में  सुख़,  समृद्धि  और  शांति  स्थापित  कर  सकता  है ; धर्म  और  विज्ञान  आपस  में  मित्र  हैं  शत्रु  नहीं। मित्र, मित्र  की  सहायता  करता  है तभी  विजय  होति  है और  यदि  मित्र  शत्रु  से  जा  मिले या  पृथक्  हो  जाए, तो  एक  मित्र  की  विजय  भी  पराजय  में  परिवर्तित  हो  जाती  है। आज  के  विश्व  को  शंति  भी  चाहिए  और  समृद्धि  भी। लोक  मंगल  के  लिए  धर्म  और  विज्ञान का  अन्योन्याश्रित  होना  परमावश्यक  है। आज  के  वैज्ञानिक  मानव  के  विषय  में  महाकवि  दिनकर  की  भावनाएँ————
    व्योम   से    पाताल    तक   सब  कुछ  उसे   है  श्रेय
    पर,  न  यह  परिचय  मनुज  का,  यह  न  एक  श्रेय।
    श्रय   उसका, बुद्धि  पर  चैतन्य  उर   की   जीत;
       श्रेय  मानव   को   असीमित   मानवों  से  प्रीत।
   एक   नर   से  दूसरे  के  बीच  का  व्यवधान
   तोड़   दे  जो  बस ,  वही   ज्ञानी   वही   विद्वान।। का  अन्योन्याश्रित  होना  परमावश्यक  है। आज  के  वैज्ञानिक  मानव  के  विषय  में  महाकवि  दिनकर  की  भावनाएँ————
    व्योम   से    पाताल    तक   सब  कुछ  उसे   है  श्रेय
    पर,  न  यह  परिचय  मनुज  का,  यह  न  एक  श्रेय।
    श्रय   उसका, बुद्धि  पर  चैतन्य  उर   की   जीत;
       श्रेय  मानव   को   असीमित   मानवों  से  प्रीत।
   एक   नर   से  दूसरे  के  बीच  का  व्यवधान
   तोड़   दे  जो  बस ,  वही   ज्ञानी   वही   विद्वान।।

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योगिनी एकादशी

आषाणबदी  एकादशी को योगिनी  एकादशी  के  नाम  से  पुकारते  हैं। इस  दिन  भगवान  नारायण  के  व्रत  और  पूजा  का  विधान  है।भगवान  की  प्रतिमा  को  स्नान  कराके  स्वच्छ  वस्त्रों  से  सजाते  हैं।धूप-दीप  आदि से  आरती करके ब्राह्मणों  को  भोजन  कराके  दान  देते  हैं। इस  व्रत  पूजन से  पाप  शाप  तथा  कोढ  तक  दूर  हो  जाता  है।

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सुविचार

जीवन   है   परलोक   का   खेत। जो  अभी   यहाँ   बोया  जाएगा,  वह  परलोक  में  काटा  जाएगा।

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सुविचार

अज्ञानी  और  ज्ञानी  में  केवल  भेद  यह  है  कि  अज्ञानी  विचार  की  सीमा  के  भीतर  रहता  है  और  ज्ञानी  विचार  की  सीमा  से  बाहर  रहता  है।

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