Archive for अक्टूबर, 2008

भैया-दूज

भाई-बहन   के   अक्षय  स्नेह  का  प्रतीक  भाई-दूज    सभी   घरों    में   बड़े   उत्साह  के  साथ   मनाना   चाहियें।इसका  मुख्य  ध्येय    भाई-बहन  का  मिलाप  है।बहन   को  अपने भाई   की  पूजा  करनी  चाहियेऔर  उसकी   दीर्धायु  की   कामना  करनी   चाहिये।यमराज  के   साथ   इस  दिन  सूर्य  की  बेटी  यमुना  की  भी  पूजा  की  जाती  है।यमराज  से  प्रार्थना  करें कि  “हे  यमराज, मेरे  भाई की   दीर्धायु  करो।”

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यमद्वितिया(भैया-दूज) की शुभकामना।

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गोवर्धन-पूजा

कार्तिक   शुक्ला   प्रतिपदा   को, दीवाली   से   अगले   दिन, यह   उत्सव   मनाया   जाता   है।इस   उत्सव   का   वर्तमान   रुप   द्वापर   युग  में    भगवान्  श्रीकृष्ण   के   अवतार   के   पश्चात्   से   आरम्भ   हुआ   है  किन्तु   इसका   उल्लेख    इससे   पूर्व   वेदों    में   भी    पाया   जाता   है।इसलिए   इसे   वैदिक   महोत्सव   भी   कहा  जाता  है। घर   पर   अन्नादि   के   पदार्थ   बनाकर   भोग   लगाते   हैं।गोवर्धन    महाराज   को   दूध   चढ़ाते    हैं।व्यापारी    लोग  अपना   नया   साल  इसी   दिन   से   आरम्भ   करते   हैं।

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शुभकामना

पावन   पर्व   दीपमाला   का,
आओ   साथी   दीप   जलाएं।
सब   आलोक   मंत्र    उचारें,
घर-घर  ज्योति  ध्वज   फहराएँ।।
सभी  को   दीवाली   की   बहुत-बहुत  शुभकामना।प्रत्येक   भारतवासी  का  यह  परम   कर्तव्य   है कि  वे  इस   महान, उपयोगी  पर्व  को   सामाजिक   कुरीतियों   से   बचाए।

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दीपावली, दीवाली, दीपमाला आप सभी के लिये शुभ हो।

दीपावली   भारत  का  अत्यन्त  प्रसिद्ध पुरातन  साँस्कृतिक  और  प्रेरणादायक  पर्व  है।होली  के  समान   दीपावली  भी  भारत  कर  कृषक  समाज  में   एक  समृद्धि-पूर्ण  नवजीवन  का  संदेश  लेकर  आती  है।इस  अवसर  तक  किसानों  की  ख़रीफ  की  फसल  कट  कर  घर  आ  जाती  है।एक  ओर   उनके  कोठार  अन्न  से  भरते  हैं  दूसरी  ओर  उनके  ह्रदय आनन्द  से  भर  कर  गा  उठते  हैं—-
    “होली  लाई  पूरी  दिवारी  लाई  भात”
अर्थात्  होली  गेहूं  की  फसल  लेकर  आती  है  और  दीवाली  धान  की।
 दीपावली   के   साथ   अनेक   महापुरुषों   के  जीवन-चरित्र  संबद्ध  है।  दीपावली  हमें  संगठन, आलोक  और  त्याग  का  संदेश  देती   हुई  कहती  है——
                          दीपमाला  कह  रही  है,  दीप-सा  युग-युग  जलो।।
                          घोरतम  को  पार  कर,   आलोक  बनकर  तुम  ढलो।।

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दीवाली मनाने के कुछ कारण—–

१=  जब  भगवान  विष्णु  ने  वामन  का  रुप  बनाकर  राजा  बलि  को  पाताल  भेजा  था  तब  इन्द्र  देव  ने  प्रसन्न  हो  घी  दीपक  जलाकर  दीवाली  मनाई  थी।
२= इस  दिन  समुद्र  मन्थन  से  लक्ष्मीजी   प्रकट  हुई  थीं  और  विष्णु  को  अपना  पति  बनाया  था।
३= जब  श्रीरामचन्द्रजी   रावण  को  मारकर  अयोध्या  में  आये  तो  उनका  राजतिलक  किया  गया  था।
४= इसी  दिन राजा  विक्रमादित्य  ने  अपना  सम्वत  चलाने  का  विचार  किया  था।
५= महार्षि  स्वामी  दयानन्द  सरस्वती  का  इसी  दिन  निर्वाचन  होने  का  कथन  है।

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लक्ष्मी-पूजन(दीवाली)

कार्तिक  कृष्णा  अमवस्या  को  यह  पर्व  मनाया  जाता  है। इस  दिन  लक्ष्मी पूजन  का  विशेष  महत्व  है।यह  त्यौहार  वैश्यों  का  कहलाता  है। परन्तु  लक्ष्मी  को  प्रसन्न  करने  के  लिये  इसे  सभी  मनाते  हैं।इसमें  गणेश-लक्ष्मी  कुबेर  इन्द्र  विष्णु  सरस्वती  तथा  ठाकुर जी  की  पूजा  करनी  चाहिये। व्यापारीवर्ग वहीं  खाते  कलम  दवात  की  भी  पूजा  करते  हैं।सब  देवताओं  का  षोडस  प्रकार  से  पूजन  करना  चाहियें।ब्रह्म-पुराण  में  लिखा  है  कि  कार्तिक  अमावस्या  को  अर्द्धरात्रि  में   लक्ष्मी  महारानी    सद् ग्रहस्थों  के  मकानों  में  जहाँ-तहाँ  विचरण  करती  हैं।इसलिये  अपने  मकानों  को  सब  प्रकार  से  स्वच्छ, शुद्ध   और  सुन्दर  रीति  से  सजाकर  दीवाली  मनाने  से  श्री  लक्ष्मी  जी   प्रसन्न  होती  हैं  और  उसमें  स्थाई  रुप  से  निवास  करती  हैं।खील बताशा मीठा  आदि  का  भोग  लगाना  चाहियें।हवन  भी  करना  चाहियें।इस  दिन  जितना  भी  श्रद्धा  हो   माता-पिता  को  भेंट  देकर  उनको  प्रणाम  कर  आशीर्वाद  प्राप्त  करें।

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