Archive for जुलाई, 2008

सत्य वचन

हिमालय    में    जाकर   नहीं   बल्कि    अहंकार   का   नाश    करके   सन्यास    का   लक्ष्य     पूरा   होता   है।

निश्चयपूर्वक    विवेक     कीजिए।    विकासपूर्वक    विस्तार    कीजिए।  जिज्ञासापूर्वक    अनुसंधान     कीजिए।

जीवन    को   नीरस    और    डरपोक     बनाना    आपको    शोभा    नहीं    देता। आपको     पता   होना     चाहिए    कि    आपमें     सर्वशक्तिमान्     सर्वज्ञ   परमात्मा     का    निवास    है।

संसार   के    पदार्थ   सुन्दर   होते   हैं ,    लेकिन   इनसे   भी    अधिक   सुन्दर   है   मन    और    मन   से   भी    अधिक   सुन्दर   है   आत्मा।

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कुछ शायरी

 ख़ुदा   के   राज़   को,   इन्सां   का   ज़हन,     क्या    समझे।
 फ़लक   कहां   है,   ज़मी   क्या   है,    ज़िन्दगी    क्यों    है।।

रात    भर    बात    तारों    से    होती    रही।
दास्तां    उनको    अपनी     सुनाते   रहे।।

 ज़िंदगी     क्या   है,    एक     बाजी     है।
 जीतना    है,      तो     हारते    रहिये।।

अजब   ये     मुहब्बत     का     दस्तूर     है।
सताना,   रुलाना,  हंसाना    कभी।।

 सारी   दुनिया   से    मुझे,   कुछ   भी   मिले   या   न  मिले।
 मुझको   तो   बस   तेरी    नज़रों      की     इनायत    चाहिए।।

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अनमोल सत्य वचन

१—–अकेला      रहना     एकान्त    नहीं ,  परन्तु    मन   को    ख़्यालों   से    रहित   करना    सच्चा   एकांत    है।
२—–एक    महापुरुष    का    वचन   है    कि    मकोड़ी     की     भाँति   नम्र   बनो ,  जो   पैरों    से   कुचली   जाती   है ,  लेकिन   कुछ   भी    कहती   नहीं। ततैये   की    भाँति   कठोर    न   बनो ,  जो   आकाश   में     उड़ता   है   परन्तु     सबको   पीड़ा    देता    है।
३—–जो    द्वेष     के     कारण     आपको     गालीयाँ     दे , उसे   तुम    दिल     से    दुआएँ दोगे    तो  आपमें     विष    को    अमृत    बनाने   की     शक्ति  आ    जाएगी।
४—-मूर्ख    वे   हैं ,  जो   पीढ़ियाँ    बताकर    अपने    को    बड़े     खानदान      वाला    मानते    हैं   लेकिन   असली     खानदानी      वही    है ,  जो   गुणवान    है।
५—–गुणवान    व्यक्ति      कभी      अभिमानी     नहीं      होता।  फल    वाली      डाली     सदैव    झुकी     रहती     है।

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बाल दुर्घटनाएँ

छोटे    बच्चे    अबोध   और    चंचल   होते   हैं , इसलिये     अक्सर   गिरते-पड़ते   रहते  हैं। ऐसी   स्थिति    में   चोटें     लगनी   स्वाभाविक   हैं। परन्तु   कई     बार   मामूली    दुर्घटना    भी   खतरनाक    रुप   धारण   कर   लेती   है।  यदि   हम   माता-पिता  कुछ    सावधानियाँ   बरतें  तो   बच्चे  को   हर  संभव    ख़तरे  से    बचाया   जा   सकता   है।बच्चे  के  स्वभाव    में   उत्सुकता   होती   है, चीज़ों    को   देखने, पकड़ने  और   उसे  मुँह   में   लेने  की। कुछ    समय  पहले   भारत    में   ज़्यादातर    घर  संयुक्त   होते  थे, यहां    घर   भी   बड़े-बड़े   थे और    बच्चों  को   देखने   के  लिये    अनुभवशील  दादियाँ    और    ताइयां   परिवार    में     रहती   ही   थी। बदलते   समय   में   घर   छोटे   हो   रहे   हैं। दो  कमरों  में  ही   मनुष्य    की   पूरी   ज़िदगी    बीत   जाती   है। संयुक्त   परिवारों    का   प्रचलन   भी     लगभग     मिटता   जा   रहा  है। स्त्रियाँ    भी   कार्य   करने   हेतू    बाहर     निकल   रही   हैं।  ऐसे   में     बच्चों  की   देखभाल    एक   प्रमुख   समास्या  के  रुप  में  उजागर  हो  रही  है। जरुरत    से  ज़्यादा   बच्चों    को  बाँधकर   रखने   के   कारण  भी  बच्चे   होने   वाले    ख़तरों   से   अन्जान   रहते  हैं। हम  अपने   बच्चों  को    एक   सुरक्षित    वातावरण  प्रदान  करके    उनके   संभव   खतरे  को  कम  तो  कर ही सकते   हैं। आपातीय चिकित्सा  हेतू   अस्पताल  एवं  क्लिनिक   पहँचने  वाले    घायल   बच्चे  मुख्यतः  निम्न  प्रकार    की    दुर्घटनाओं    से   ग्रसित  होते   हैं———-
बच्चे     द्वारा   किसी     ठोस   वस्तु  को   निगल   लेना  ,       किसी   जहरीले   पदार्थ   को  खा  जाना  ,          जल  जाना ,         पानी   में   गिर   कर   डूबना ,        ऊँचाई     से   गिरना ,       मशीनों     से   संबंधित   घटनाएँ ,          सड़क   पर   घटित   दुर्घटनाएँ ,   जानवरों    से   छेड़छाड़
जब   बच्चा   २० महीनों    का   हो  जाता   है  तो  उसे   हम  संभावित    खतरों  से   बचाव  के  संबंध   में  कुछ    बातें   सिख   भी   सकते   हैं, जैसे    गरम  वस्तुओं  को  न  छूना,  नुकीली   वस्तुओं     से  न   खेलना  इत्यादि।
बच्चे   घर  में   खिलने   वाले     सबसे    प्यारे    फूल    हैं, ये   फूल   सदा  खिले   ही   रहें  इस  के   लिये  एक   सुरक्षित    वातावरण  अति   आवश्यक    है

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कुछ विचित्र बातें

तेरह    तरह     के   गुलर    का    फल    देने    वाला    अद्भुत  वृक्ष    प्रिटोरीया (दक्षिण  अफ्रीका)   के    नाइसना  जंगल    में    है।

रोम  इटली   में    एक   मंदिर    के    बारे   में   ऐसी     मान्यता   है  कि    उसमें     आदमी   की   खाँसी     ठीक   कर   देने   की   क्षमता   है,जो   उस  इमारत  में   एक    रात   व्यतीत   करें।

पागोनि  अलि   (आस्ट्रेलिया )   का    इंसान  सिर्फ़    सर्प    का   ही   भोजन   करता   है।

उड़ने     वाला   मेंढक  जो   वृक्षों    पर   रहता   है ,   अफ्रीका     और    यूरोप    के   देशों    में   पाया  जाता   है।

अमेरिका    की    आमेज़न  नदी   में     करेंट     पैदा   करने   वाली    मछली   पाई    जाती   है।

विमान  से  तेज़    उड़ने     वाली     मक्खी   अफ्रीका    में   पाई   जाती  है।इसका  नाम   वोट फ्लाई   है, इसे  नेट    भी    कहते  हैं।

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मेथी वाली मकई की रोटी (पाक कला )

२कप   मकई   का   आटा ,    २कप   बारीक   कटी   हुई   ताज़ी  मेथी   के  पत्ते ,  बारीक  कटा  १प्याज़ ,    २हरी मिर्च  कटी  हुई ,  नमक  स्वादानुसार ,   गरम   पानी आटा  गूँधने    के  लिये ,  घी या  तेल
आटे  को  छान  लीजिए। डंडी    उतार  कर  मेथी    को  धओकर   बारीक  काट   लीजिए।  आटे   में   कटी मेथी , प्याज़ , हरीमिर्च  और  नमक  मिलाएं। गुनगुने  पानी  की  सहायता    से  आटा  घूँध  लें। पोलीथीन    की   सहायता   से   रोटी  को  बेलें। गरम तवे  पर   रोटी   को  दोनों  तरफ  से  पकाएं, चाहें   तो  परांटे  जैसा  तल  लें।
  केवल  चार   व्यक्तियों   के  लिये

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रंगांधता

रंगों    को   न  पहचान   पाना   रंगांध   कहलाता   है।  आँख   की   बहुत   सी   बीमारियाँ   तथा   शारीरिक  रोग   प्रत्यक्ष  या   परोक्ष  में    दृष्टि   विकार    पैदा   करते   हैं   जिससे    रंगांध   होने   की   संभआवना   रहती    है। मोतियाबिंद ,  ग्लोकोमा  रेटिनाइटिस   पिकमेंटोसा, आप्टिक   नर्व  के  रोग , मधुमेह , उच्च रक्तचाप  तथा  बहुत  से  स्नायु  संबंधी   रोगों   में  रंगांध   होने   की  आशंका   रहती  है ऐसे  रोगी  जो  बहुत   समय  से   जोड़ों  के  दर्द ,  ह्रदय रोग ,     क्षय रोग ,   कोढ़ ,   उच्च रक्तचाप ,  गुरदे  के  रोग   और    मानसिक  विकार  से  पीढ़ित  होते  हैं, रंगांध    हो  सकते   है क्योंकि    दवाओं   का    मरीज़ों    के    स्नायु   तंतुओं   पर   कुप्रभाव  पड़ता   है।

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