समाजवाद और गाँधीवाद

आज  के  युग  से  पूर्व,  लगभग  दो  शताब्दियों  तक  विश्व  में  पूँजीवाद  का  अखंड  एवं  अबाध  सामा्रज्य  रहा।आज  मनुष्य  को  इन  सामाजिक और  आर्थिक  विषमताओं  ने  इतना  निरीह कर  दिया  है कि  कुछ  नहीं  कहा  जा  सकता।समाजवाद  और  गाँधीवाद  ये  दो  विचारधाराएँ  भी  मानव  समाज  को  सुख़ी, सम्पन्न  एवं  समृद्ध  बनाने  के  लिए  अपना  विभिन्न  दृष्टिकोण  प्रस्तुत  करती  हैं।यद्धपि  दोनों  विचारधाराओं  का  लक्ष्य  बिन्दु  एक  ही  है , फिर  भी, साध्य  समान  होते  हुए भी  साधनों  की  वरिष्ठता  में  पर्याप्त  अन्तर  है। गाँधीवाद  चाहता  है  कि  श्रेष्ठ  लक्ष्य  की  प्राप्ति  श्रेष्ठ  साधन  से  हो,  जबकि  समाजवादी  या  साम्यवादी  किसी  भी  साधन  का  उपयोग  अनुचित  नहीं  समझते। निःसन्देह  भारतवर्ष  में  गाँधीवाद  ही  सफल  हो  सकता  है। क्योंकि  यह  भूमि  त्याग, तपस्या  और  साधनाओं  की  ऋषि-महाऋषियों  की  भूमि  है। गाँधीवाद  अन्याय  और  शोषण  की  समाप्ति  शाँन्तिपूर्ण  अहिंसात्मक  उपायों  द्वारा  ही  करना  चाहता  है,  जबकि  समाजवाद ी  या  साम्यवादी  यह  विश्वास  रखते  हैं  कि  इस  प्रकार  की  शोषण  संस्थानों  को  शांतिपूर्ण  प्रयासों  से  नष्ट  नहीं  किया  जा  सकता।

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