धर्म और विज्ञान परस्पर एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, अपितु एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना धर्म के विज्ञान का काम नहीं चल सकता और बिना विज्ञान के धर्म का काम नहीं चल सकता।ह्रदय और मस्तिष्क का समन्वय ही संसार में सुख़, समृद्धि और शांति स्थापित कर सकता है ; धर्म और विज्ञान आपस में मित्र हैं शत्रु नहीं। मित्र, मित्र की सहायता करता है तभी विजय होती है और यदि मित्र शत्रु से जा मिले या पृथक् हो जाए, तो एक मित्र की विजय भी पराजय में परिवर्तित हो जाती है। आज के विश्व को शंति भी चाहिए और समृद्धि भी। लोक मंगल के लिए धर्म और विज्ञान का अन्योन्याश्रित होना परमावश्यक है। आज के वैज्ञानिक मानव के विषय में महाकवि दिनकर की भावनाएँ————
व्योम से पाताल तक सब कुछ उसे है श्रेय
पर, न यह परिचय मनुज का, यह न एक श्रेय।
श्रय उसका, बुद्धि पर चैतन्य उर की जीत;
श्रेय मानव को असीमित मानवों से प्रीत।
एक नर से दूसरे के बीच का व्यवधान
तोड़ दे जो बस , वही ज्ञानी वही विद्वान।।